'मधुशाला' भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए वरदान

Increasing dependency of Indian Economy on Liquor Industry
वैसे तो शराब का इतिहास भारत में मानव इतिहास की ही तरह समृद्ध और प्राचीन है और इसे प्राचीन काल में सोमरस, मद्य, कालरस, सुरा इत्यादि नामों से पुकारा जाता रहा है। परंतु प्राचीन भारत में ये सभ्य समाज का हिस्सा नहीं माना जाता था, और कई वर्गों यथा ब्राह्मणों के लिए इसका सेवन तो निषिद्ध ही था हालांकि क्षत्रियों के लिए 'सोमरस' का सेवन गौरव की बात होती थी।

"लेकिन वर्तमान परिदृश्य में देखे तो स्थिति बिल्कुल उलट है, अब 'शराब' का सेवन जाति, वर्ग व धर्म के बंधनों से आगे निकल चुका है। अब हर चार कदम पर 'अंग्रेजी शराब की दुकान' लिखा दिख ही जाता है। शहरों में तो आपको बड़े बड़े मॉडल वाइन शॉप  भी मिल जाएंगे।" 
यूं तो 'शराब' किसी का सगा नहीं होता यहाँ तक विजय माल्या का भी नहीं। जिसने इसे भारत में एक अलग ही पहचान दिलाई। लेकिन यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए किसी वरदान से कम नहीं। वैसे मेरे इस आलेख का विषय न तो 'मदिरा का इतिहास' बताना है और ना ही 'विजय माल्या' की कहानी। यह आलेख है उस धंधे के बारे में जिसके बारे में कहा जाता है कि वह फ़िलहाल पूरे देश में डेढ़ लाख करोड़ रुपए का आँकड़ा पार कर चुका है और  एसोचैम का तो अनुमान है कि यह धंधा 30% सालाना की दर से बढ़ रहा है। 
अब आइये मुख्य विषय पर प्रकाश डालते हैं ~

विजय माल्या के पिता  विट्ठल माल्या ने देश में पहली बार  'भारत निर्मित विदेशी शराब ' या   Indian Made Foreign Liquor (IMFL)  का उत्पादन  किया था  लेकिन फिर तो मानो देश में बाढ़ सी आ गई ऐसे ब्रांडों की जिन्हें' 'भारत निर्मित विदेशी शराब' का दर्जा हासिल है। 
और ऐसे ब्रांड्स (IMFL) का मार्केट शेयर 50% से अधिक है जबकि आयातित अल्कोहल (इम्पोर्टेड) उत्पादों का मार्केट शेयर मात्र 0.8% है जबकि देशी शराब उत्पादों की भी अच्छी-खासी भागीदारी है। 
    केंद्र सरकार को सालाना 2.8 ट्रिलियन का राजस्व शराब पर लगने वाले शुल्क से आता है, जिसे  'आबकारी शुल्क ' भी कहते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार  देश  के अधिकतर राज्यों  का  20% से ज्यादा का राजस्व  'आबकारी-शुल्क ' से  ही आता है अर्थात शराब पर लगने वाले एक्साइज ड्यूटी से। 
  
 गुजरात, बिहार, नागालैंड, मिज़ोरम और मेघालय को छोड़कर कर, जहां शराब पर सरकारी प्रतिबंध है,  अधिकांश राज्यों की झोली शराब से मिलने वाले राजस्व से ही भरती है। 
भारत व्हिस्की का सबसे बड़ा उपभोक्ता है और व्हिस्की का IMFL में 60% हिस्सेदारी है। इंडो-पैसिफिक रीजन में  भारत  65% शराब के उत्पादन और 7% इम्पोर्ट के साथ  एक अत्यंत महत्वपूर्ण सहभागी है। 
भारत में प्रति व्यक्ति अल्कोहल खपत 2002 में 2 लीटर के आसपास थी जो 2015 में बढ़कर 5.7 लीटर प्रति व्यक्ति हो गई। इससे पता चलता है कि  जीडीपी , प्रति आय और शहरीकरण के वृद्धि के साथ साथ शराब  की खपत भी बढ़ा है। 
   भारत में शराब उद्योग के विकास  एवं शराब खपत में वृद्धि के क्या कारण हैं? 

सम्भवतः भारत में शराब उद्योग के विकास के निम्न कारण हैं-
युवा आबादी का अधिक होना, शहरीकरण, प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि, प्रयोज्य आय (Disposable Income) में वृद्धि, सिनेमा, और युवा पीढ़ी का पश्चिम कल्चर की तरफ झुकाव। 
शहरों में पब, बार और नाइट क्लब संस्कृति बहुत तेजी से फल-फूल रही है और इस संस्कृति में शराब एक महत्वपूर्ण घटक है। 
जहां तक हमे लगता है भारत में अधिकाशं लोग शो ऑफ करने के लिए ही पीते हैं लेकिन कुछ शौकिया भी पीने वाले वाले  हैं। फिर भी पीना तो पीना ही होता है। 
Disposable Income - आय (करों व अन्य कटौतियों  के बाद)  जो आपके लिए बचत या ख़र्च के लिए उपलब्ध है। 

भारत में शराब उद्योग के लिए बड़ी संभावनाएं हैं और यह दुनिया का सबसे तेजी से उभरता बाजार भी है । 
जिसके कई कारण हैं, जैसे शहरीकरण - शहरीकरण में वृद्धि  एक अत्यंत महत्वपूर्ण कारक है।मुख्यतः शहरी उपभोक्ताओं की पहली पसंद Brown liquor है और इससे राज्यों को भारी राजस्व मिलता है। 
केंद्र को शराब से मिलने वाले राजस्व में सबसे ज्यादा योगदान साउथ जोन का है। अर्थात दक्षिण भारत के राज्यों से  (महाराष्ट्र और गोवा भी साउथ जोन में आते हैं) जो कि 50% से भी अधिक है । 
  
आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक सबसे बड़े उपभोक्ता हैं लेकिन अगर प्रति व्यक्ति उपभोग की बात करें तो गोवा और महाराष्ट्र क्रमशः प्रथम व द्वितीय स्थान पर हैं। 
तमिलनाडु के राजस्व में सबसे ज्यादा योगदान  'आबकारी कर '  का है। 

भारत के विभिन्न राज्यों  में शराब-सेवन के लिए वैध उम्र अलग अलग है जैसे  गोवा, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में  18 वर्ष,  तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश में 21 वर्ष,  महाराष्ट्र, दिल्ली और  पंजाब में  25 वर्ष। लेकिन इसको लेकर भी राजनीतिक घमासान होते रहते हैं। कोई पार्टी अपने चुनावी वादों में  शराब-बंदी की बात करती हैं तो कोई 'शराब-बिक्री कर ' को कम करने की। 
जैसे बिहार की नीतीश कुमार की पार्टी (JDU) के चुनावी मैनिफेस्टो में  'शराब बंदी ' एक मुख्य मुद्दा है। वो इसे हर चुनावी वर्ष में भुनाते हैं। जबकि उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी के 2012 के मैनिफेस्टो में  (जिसका नेतृत्व अखिलेश यादव कर रहे थे) 'शराब बिक्री कर ' अर्थात आबकारी शुल्क को कम करने का वादा किया गया था और इस वादे का समाजवादी पार्टी को लाभ भी हुआ और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने। इस प्रकार से ये कहा जा सकता है कि भारत में शराब  आर्थिक और राजनीतिक दोनों रूप से महत्वपूर्ण है। 

                 नोट - ये लेखक के अपने विचार हैं।
By    #KaushikDubey  
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