'वीर सावरकर' पर विवाद के पीछे की असली वजह क्या है? | वीर सावरकर कौन थे?

Writer - Kaushik Dubey 

The Indic Info - दशकों पहले (1966) मृत्यु के बाद भी 'वीर सावरकर' वर्तमान भारतीय-राजनीति में एक जिंदा व्यक्ति की तरह हैं। 
'वीर सावरकर' हीरो या विलेन? यह भारत के वर्तमान   राजनीतिक परिदृश्य में सबसे चर्चित और विवादित   विषय है। वीर सावरकर का नाम सुनते ही जहाँ कुछ   लोगों का सीना गर्व से फूल जाता है तो कुछ लोगों को ये   नाम सपने में भी डराता है। 
 देश की रूलिंग पार्टी यानी भाजपा सावरकर  को अपना   आदर्श मानती उन्हें हीरो कहती है जबकि देश की     मुख्य विपक्षी पार्टी यानी कॉंग्रेस  को सावरकर  फूटीी   आंख नहीं सुहाते हैं। 
ऐसा क्यों है इस पर आज हम अपने ब्लॉग में पूरे विस्तार से चर्चा करेंगे-

 सावरकर का जन्म और शुरुआती    जीवन 


वीर सावरकर का जन्म 28 मई, 1883 को नासिक(महाराष्ट्र) जिले के भागूर ग्राम में हुआ था। उनके पिताजी का नाम दामोदर पन्त सावरकर था और उनकी माताजी का नाम राधाबाई था। वीर सावरकर एक देशभक्त क्रांतिकारी थे और वह हिन्दुत्व के हिमायती थे। उनहोंने अपनी पढाई फर्ग्युसन कॉलेज ,पुणे से पूरी की थी।
वीर सावरकर जब नौ वर्ष के थे तभी उनके माँ का देहांत हो गया था, 7 वर्ष बाद पिता की भी मृत्यु भी हो गई जिसकी वजह से परिवार का सारा दारोमदार बड़े भाई गणेश सावरकर पर आ गया। 
वीर सावरकर जब महज़ 12-13 वर्ष के थे तभी महाराष्ट्र में भीषण हिन्दू-मुस्लिम दंगा शुरू गया, दंगे के दौरान सावरकर ने अपने मित्रों के साथ मिलकर गांव की एक मस्जिद को तोड़ने का प्रयास किया। यह घटना 'सावरकर' के मन में मुस्लिमों के प्रति नफ़रत को दर्शाता है परंतु कुछ इतिहासकारों का मानना है कि सर्वप्रथम मुस्लिमों ने गाँव के पास के ही एक मंदिर को तोड़ा था इसलिए सावरकर ने भी गुस्से में आकर मस्जिद को तोड़ने का प्रयास किया। 
1901 में वीर सावरकर का विवाह यमुनाबाई से हुआ। उनके दो पुत्र और एक पुत्री थी। यमुनाबाई के पिताजी ने वीर सावरकर की काफी आर्थिक मदद की और उनकी उच्च शिक्षा का खर्च भी वहन किया।
वीर सावरकर की विश्वविद्यालय की पढ़ाई का भार उनके ससुर ने उठाया था। उन्होने फर्ग्यूसन कॉलेज से बी.ए (कला क्षेत्र) की उपाधि प्राप्त की थी। वर्ष 1909 में 'तिलक' की अनुशंसा पर स्काॅलरशिप पाकर वीर सावरकर ने लंदन जा वकालत की डिग्री हासिल की।

💡 सावरकर एक नास्तिक थे और वे हिन्दू धर्म की बहुत सी बातो को अंध विश्वासी मानते थे। 
               

   'मित्र-मेला'  का गठन 


दामोदर सावरकर के अंदर युवापन से ही नेतृत्व करने, भाषण देने और राजनीतिक दूरदृष्टि जैसी विलक्षण प्रतिभा थी। वो प्रखर वक्ता और निर्भीक क्रांतिकारी थे। 
1897 की गर्मियों में महाराष्ट्र में प्लेग फैला हुआ था, जिसपर अंग्रेजी हुकूमत ध्यान नहीं दे रही थी। इस बात से क्षुब्ध हो कर दामोदर चापेकर ने ब्रिटिश ऑफिसर W.C Rand को गोली मार दी, जिस कारण उन्हें मौत की सजा दे दी गयी।तब सावरकर मात्र 14 वर्ष के थे, इस घटना के बाद सावरकर ने अंग्रेजों के विरुद्ध क्रान्तिकारी गतिविधियाँ बढाने के लिए “मित्र मेला” का गठन किया। 
अपने ऑफिसर की हत्या के बाद अंग्रेजों ने अपने खुफिया-तंत्र को काफी सक्रिय कर दिया था जिससे क्रांतिकारी प्रवृत्ति वाले लोगों का मिलना-जुलना मुश्किल हो गया था। इसी समस्या के निवारण के लिए 14 वर्षीय सावरकर ने 'मित्र मेला' का गठन किया जिसमें स्कूली छात्र छुट्टी के बाद मेला के नाम पर एक जगह एकत्रित होते थे, कभी कभी सावरकर अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ़ छात्रों में जोश भरने के लिए जबरदस्त जोशीला भाषण🎙️देते थे। 

                     अभिनव भारत संगठन 

वीर सावरकर के जीवन का एक ही लक्ष्य था - भारत की आज़ादी, स्वाधीनता और स्वशासन। 
फर्ग्यूसन कॉलेज में पढ़ने के दौरान उन्होंने छात्रों को संगठित किया और 1904 में अभिनव भारत संगठन की। इस दौरान उन्होंने इतिहास, कानून और दर्शनशास्त्र का गहन अध्ययन किया, कई किताबे पढ़ीं और व्यायामशालाओं में मित्रों के साथ खूब पसीना बहाया। 
इन्हीं दिनों वो श्री  लोकमान्य तिलक  के  संपर्क में आए और उनसे देश की आज़ादी के विषय में चर्चा करते थे, उनसे राजनीतिक सलाह लिया करते थे। 
 1905 बंगाल के विभाजन के विरोध में उन्होने विदेशी वस्त्रों की होली जलायी थी। वर्षों बाद महात्मा गाँधी ने भी स्वदेशी आन्दोलन में ऐसा ही किया था। इस घटना से कॉलेज एडमिनिस्ट्रेशन नाराज हो गया और सावरकर को डिसमिस कर दिया गया। पर बाकी छात्रों के दबाव और तिलक की अनुरोध पर उन्हें एग्जाम देने दिया गया और वे अच्छे नम्बरों से पास हुए
      
                   लंदन प्रवास (1906-10)

नेहरू और मोहन दास करमचंद गांधी की तरह सावरकर धनी परिवार से नहीं थे, नेहरू और मोहनदास की तरह वो अपने पिता के पैसे से लंदन नहीं जा सकते थे।

वीर सावरकर एक छोटे से गाँव के किसान के बेटे थे, उनके पिता की मृत्यु, जब वो सात वर्ष के थे, तभी हो गई थी अतः उनके लिए लंदन जाकर उच्च शिक्षा ग्रहण करना दूर की कौड़ी थी। लेकिन उनके लगन और अथक परिश्रम को देखकर तिलक जी काफ़ी प्रभावित हुए और उन्हीं की अनुशंसा पर सावरकर को स्काॅलरशिप मिल गया और वे बार-एट-लॉ की पढ़ाई के लिए लंदन रवाना हो गए। 
चूंकि वीर सावरकर अपने क्रांतिकारी व्यवहार की वजह से अंग्रेज़ों के निगाह में थे अतः भारत में मौजूद ब्रिटिश अधिकारियों ने लन्दन में इनपर विशेष नज़र रखने की सूचना भेजी।

💡लंदन में वे इंडिया हॉउस में रहने लगे वहाँ उनकी मुलाकात लाला हरदयाल, मदन ढींगरा जैसे क्रांतिकारी छात्रों से हुई। सावरकर ने सभी को अभिनव भारत संगठन से जोड़ लिया। 

💡अपने लन्दन प्रावास के दौरान ही वर्ष 1908 में वीर सावरकर ने एक किताब भी लिखी थी, जिसका नाम था- “फर्स्ट वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस”। हालांकि ब्रिटिश अधिकारीयों ने इसेजब्त कर लिया और किताब पब्लिश नहीं हो पायी।

इन्ही दिनों सावरकर ने हर्बर्ट स्पेंसर, अगस्त कॉमटे, और माजिनी को पढ़ा ताकि वे अभिनव भारत का सिद्धांत गढ़ सकें।
🔥बैरिस्टर की परीक्षा पास कर लेने के बावजूद वीर सावरकर ने ओथ लेने से इनकार कर दिया क्योंकि उन्होंने भारत पर ब्रिटिश आधिपत्य स्वीकार्य नहीं था।🔥

निःसंदेह वीर सावरकर अत्यंत स्वाभिमानी और अनन्य देशभक्त थे। 

            कर्जन वायली और जैक्सन की हत्या 

सावरकर के परम मित्रों में से एक मदन लाल ढींगरा ने 1 जुलाई 1909 में विलियम कर्जन वायलि की गोली मारकर हत्या कर दी, उस दिन कर्जन वायलि सपत्नीक इम्पीरियल इन्सटिट्युट में आयोजित एक समारोह में भाग लेने आया था, जब वो हॉल से निकल रहा था तभी ढींगरा ने उसपर ताबड़तोड़ गोलियां चला दीं। गलती से कर्जन को बचाने के लिए बीच में आने वाले एक पारसी डॉक्टर को भी गोली लग गयी और उसकी भी मौत हो गयी।

कर्जन वायली की हत्या के जुर्म में मदनलाल को मार्च 1910 में फांसी दे दी गई। सावरकर ने इसका विरोध किया और ढींगरा को गलत मानने वाले एक भारतीय दल (तथाकथित उदार दल) के खिलाफ़ भी आवाज उठाई। 
इस घटना के बाद सावरकर ब्रिटिश अधिकारीयों की नज़र में और चढ़ गए थे इसलिए वो फौरन फ़्रांस चले गए।
जब सावरकर पेरिस में थे तभी अभिनव भारत के एक सदस्य अनंत कान्हार  ने नासिक केे कलेक्टर जैक्सन  की हत्या कर दी, इस हत्या के लिए भी सावरकर को जिम्मेदार माना गया। सावरकर अपनी सभी गतिविधियां अत्यंत चतुराई से निर्वहन करते थे। इसलिए ब्रिटिश सरकार को उन पर कार्रवाई का मौका नहीं मिलता था।
      
सावरकर की गिरफ्तारी और  भागने का  प्रयास 

वापस लंदन आने के बाद सावरकर को गिरफ्तार कर लिया गया, उन पर आरोप था कि उन्होंने जैकसन को मारने के लिए हथियार भिजवाया था। 
जब वे जेल में थे तब उन्हें पता चला कि उनको फ़्रांस के Marseille पोर्ट से होते हुए भारत ले जाया जाएगा तो उन्होंने फौरन फरार होने का प्लान बनाया। उनका मानना था कि फ़्रांस में शरण मिल जाने पर वो ब्रिटिश लॉ से बच जाएंगे। 

जब उनका जहाज मार्सैय के तट पर पहुँचने वाला था तभी उन्होंने टॉयलेट जाने का बहाना किया और पोर्टहोल के स्क्रू खोल कर समुद्र में कूद गए और तैरते हुए तट की ओर बढ़ने लगे।
पर दुर्भाग्यवश जहाज पर खड़े किसी ब्रिटिश ने उनको देख लिया और तुरंत ही ब्रिटिश गोताखोर भी उनको पकड़ने के लिए समुद्र में कूद पड़े, जहाज से उनपर गोलियां चलाई जा रही थीं। वे गोलियों से तो बच गए पर गोताखोरों ने उन्हें पकड़ लिया और ब्रिटिश पुलिस के हवाले कर दिया। 

वीर सावरकर को उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों की वजह से एक नहीं दो-दो सश्रम आजीवन कारावास यानी 50 वर्ष की सज़ा दी गई। यह पहली बार था जब किसी को  दोहरे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। 
सज़ा काटने के लिए जिस जेल का चुनाव किया गया था उसका नाम भी सुनकर लोग कांप जाते थे। ये जेल थी अंडमान आइलैंड पर बनी सेल्युलर जेल, जो काला-पानी नाम से कुख्यात थी। 
जब सावरकर जेल गए तो वहाँ पहले से ही उनके कुछ साथी और उनका सगा भाई गणेश सावरकर वहाँ पर बंद थे। 
     
       जेल में मिली भयंकर यातनाएं  और कोठरी न. 52

सेल्युलर जेल दुनिया के सबसे क्रूर और अमानवीय जेलों में से एक था। ये जेल अंडमान आइलैंड के पोर्ट ब्लेयर में था जो चारों ओर से समुद्र से घिरा हुआ था। इस जेल में जाने के बाद भागने का कोई रास्ता नहीं था। 
दामोदर सावरकर को 698 कमरों वाले वाले सेल्युलर में  13.5 गुणा 7.5 फ़ीट की कोठरी नंबर 52 में रखा गया.
वहाँ के जेल जीवन का ज़िक्र करते हुए आशुतोष देशमुख, वीर सावरकर की जीवनी में लिखते हैं, "अंडमान में सरकारी अफ़सर बग्घी में चलते थे और राजनीतिक कैदी इन बग्घियों को खींचा करते थे."
"वहाँ ढंग की सड़कें नहीं होती थीं और इलाक़ा भी पहाड़ी होता था. जब क़ैदी बग्घियों को नहीं खींच पाते थे तो उनको गालियाँ दी जाती थीं और उनकी पिटाई होती थी. परेशान करने वाले कैदियों को कई दिनों तक पनियल सूप दिया जाता था."
"उनके अलावा उन्हें कुनैन पीने के लिए भी मजबूर किया जाता था. इससे उन्हें चक्कर आते थे. कुछ लोग उल्टियाँ कर देते थे और कुछ को बहुत दर्द रहता था."
" सेलुलर जेल में रखे गए कैदीयों से खूब काम कराया जाता था। उन्हे भर पेट खाना भी नहीं दिया जाता था। नारियल छील कर उसका तेल निकालना, जंगलों से लकड़ियाँ काटना, तेल निकालने की चक्कियों में कोल्हू के बैल की तरह मजदूरी करना और पहाड़ी क्षेत्रों में दुर्गम जगहों पर हुकुम के मुताबिक काम करना, यह सब कठिन काम वीर सावरकर को सेलुलर जेल के अन्य कैदीयों के साथ करने पड़ते थे।"
इसके अलावा छोटी-छोटी गलतियों पर कैदियों की खूब पिटाई की जाती आर काल कोठरी में कई-कई दिन तक भूखे प्यासे रखा जाता था।

देशमुख आगे लिखते हैं, "सभी कैदियों को शौचालय ले जाने का समय नियत रहता था और शौचालय के अंदर भी उन्हें तय समय-सीमा तक रहना होता था। "
"कभी-कभी कैदी को जेल को जेल के अपने कमरे के एक कोने में ही मल त्यागना पड़ जाता था।" 
"जेल की कोठरी की दीवारों से मल और पेशाब की बदबू आती थी. कभी कभी कैदियों को खड़े खड़े ही हथकड़ियाँ और बेड़ियाँ पहनने की सज़ा दी जाती थी."
"उस दशा में उन्हें खड़े खड़े ही शौचालय का इस्तेमाल करना पड़ता था. उल्टी करने के दौरान भी उन्हें बैठने की इजाज़त नहीं थी। "

              सावरकर के माफ़ीनामे का सच 

 नेहरूवादी और वामपंथी इतिहासकारों ने सावरकर को लेकर झूठ फैलाया कि सावरकर ने 6 बार माफ़ी पत्र अंग्रेजों को सौंपा था और वो अंग्रेजों के दलाल बन गए थे। दरअसल, ये सब नेहरू के कहने पर ही लिखा गया था चूंकि नेहरू खुद वामपंथी झुकाव वाले नेता थे अतः अन्य वामपंथियों की ही तरह वो भी भारत, भारत की संस्कृति और सच्चे राष्ट्रवादियों से नफ़रत करते थे। 
वीर सावरकर एक सच्चे राष्ट्रवादी थे और इसलिए नेहरू के दरबारी इतिहासकारों ने जनता को गुमराह करने के लिए ये झूठ फैलाया की  'सावरकर ' तो अंग्रेजों के एजेंट हैं।
लेकिन एजेंट  'नेहरू ' थे या  'सावरकर 'आप इस फोटो से समझ सकते हैं - 
सावरकर ने जितना कष्ट, जितनी पीड़ा, जितना उत्पीड़न झेला था उसका 5% भी अगर नेहरू झेले होते तो मैं उनको 'वीर' जवाहर लाल नेहरू मानता। 
जिस जेल में सावरकर 14 वर्ष थे, उस जेल में नेहरू 14 दिन भी रह कर दिखा देते तो मैं उनको 'क्रांतिकारी' मानता। लेकिन नेहरू जेल जाते क्यों, नेहरू तो अंग्रेजों के साथ बैठ कर सिगार फूंकते थे, उनका कपड़ा पेरिस जाता था धुलने के लिए। अंग्रेजी मैम के साथ उनके मधुर रिश्ते हुआ करते थे, तो नेहरू क्यों जाते जेल? 
लेकिन फिर भी नेहरू देशभक्त बना दिए गए, और सावरकर अंग्रेजों के एजेंट। वाह रे! इंडिया. 
सावरकर की जिंदगी पर गहन शोध करने वाले निरंजन तकले लिखते हैं, 
"सावरकर जिस कोठरी न. 52 में बंद थे ठीक उसके नीचे सेल्युलर जेल का फांसी घर था जहां प्रतिदिन 2-3 क्रांतिकारियों को फाँसी दी जाती थी। सम्भवतः ये उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के लिए था। जिससे वो माफ़ी माँगने पर विवश हुए।" 
वीर सावरकर ने अवश्य माफ़ीनामा अंग्रेजों को दिया था, लेकिन उनसे पहले श्री वल्लभ भाई पटेल और महात्मा गांधी ने उनको 'माफ़' करने के लिए अंग्रेजों को पत्र लिखा था। 

जेल से बाहर रहने के लिए बनाई थी ये रणनीति

बाद में सावरकर ने खुद और उनके समर्थकों ने अंग्रेज़ों से माफ़ी माँगने को इस आधार पर सही ठहराया था कि ये उनकी रणनीति का हिस्सा था, जिसकी वजह से उन्हें कुछ रियायतें मिल सकती थीं.
सावरकर ने अपनी आत्मकथा में लिखा था, "अगर मैंने जेल में हड़ताल की होती तो मुझसे भारत पत्र भेजने का अधिकार छीन लिया जाता."
इंदिरा गांधी सेंटर ऑफ आर्ट्स के प्रमुख 'राम बहादुर राय' का एक इंटरव्यू देखा था मैं, उसमें वो किसी पत्रकार से कहते हैं कि  
"वीर सावरकर एक चतुर क्रांतिकारी थे, उनकी कोशिश रहती थी कि भूमिगत रह करके उन्हें काम करने का जितना मौका मिले, उतना अच्छा है. मेरा मानना ये है कि सावरकर इस पचड़े में नहीं पड़े की उनके माफ़ी मांगने पर लोग क्या कहेंगे. उनकी सोच ये थी कि अगर वो जेल के बाहर रहेंगे तो वो जो करना चाहेंगे, वो कर सकेंगे। "

रिहाई के बाद

रिहा होने के कुछ दिनों बाद सावरकर ने 23 जनवरी 1924 को रत्नागिरी हिन्दू सभा का गठन किया जिसका उद्देश्य भारत की प्राचीन सभ्यता को बचाना और सामजिक कार्य करना था। 
उन्होंने हिंदी भाषा को देश भर में आम भाषा के रूप में अपनाने पर जोर दिया और दिया और हिन्दू धर्म में व्याप्त जाति भेद व छुआछूत को ख़त्म करने का आह्वान किया।

💡 पहली बार ‘हिंदुत्व’ शब्द प्रयोग करने का श्रेय वीर सावरकर को ही जाता है।

                            मृत्यु  (1966)

वीर सावरकर ने 82 वर्ष की आयु में 1 फ़रवरी 1966 को मृत्युपर्यन्त यानि जब तक मौत ना हो जाए तब तक उपवास करने का प्रण लिया। जाहिर है कोई आम इंसान इस निर्णय पर टिका नहीं रह पाता लेकिन एक सिद्ध योगी के सामान सावरकर अपने प्रण पर टिके रहे और 26 फरवरी, 1966 को ईहलोक छोड़कर परलोक सिधार गए।
   
  प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और वीर सावरकर 

 श्रीमती इंदिरा गांधी  सावरकर बहुत बड़ी प्रशंसक थीं, उनके साहस और देशभक्ति की कायल थीं। 
सावरकर के निधन के बाद उन्होंने एक पत्र में कहा था, 
 "उनका नाम साहस और देशभक्ति का पर्यायवाची था. सावरकर एक पारंपरिक क्रांतिकारी के ढांचे में गढ़े हुए इंसान थे और अनगिनत लोगों ने उनसे प्रेरणा ली थी.’ तत्कालीन सरकार ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट 
भी जारी किया था. इसके अलावा श्रीमती इंदिरा गांधी ने उनकी स्मारक निधि के लिए 11,000 रुपये का दान दिया और श्री सावरकर के कृतित्व पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाने की अनुमति भी प्रदान की।इन सब के बाद इंदिरा के पोते राहुल गांधी को इस तथ्य पर विचार करना चाहिए कि क्या उनकी दादी एक ‘गद्दार’, ‘कायर’ और महात्मा गांधी की हत्या में संलिप्त व्यक्ति की प्रशंसा कर रहीं थी?"

ऐसे महान भारत माँ के सपूत को सादर प्रणाम। 🙏🙏
आपसे विनती है कि लेख अगर अच्छा लगे तो अपने दोस्तों के साथ जरूर शेयर करियेगा। 
धन्यवाद! 
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