' प्रोपेगेंडा या मनोवैज्ञानिक युद्ध ' क्या होता है? क्या भारत चीन के 'प्रोपेगेंडा पाश' में फंस चुका है?

                            By  Kaushik Dubey 
LAC पर भारत और चीन के बीच तल्खी बढ़ती जा रही है। दोनों तरफ़ की सेनाएँ आमने-सामने हैं। दोनों देशों ने तोपों और वायुसेना को भी तैनात कर रखा है और युद्ध से पहले की सभी जरूरी तैयारियाँ जैसे रणनीतिक सड़कों, पुलों और हवाई पट्टियों के निर्माण का कार्य दिन-रात जारी है।
प्रधानमंत्री मोदी के लेह दौरे और उनके सख्त संदेश के बाद  P-14 से चीनी सैनिकों के 2 किलोमीटर पीछे हटने की ख़बर है।
लेकिन भारत ने सीमा पर युद्धाभ्यास जारी रखा है और  अपने सैन्य शक्ति को धार देने में लगा हुआ है क्योंकि भारत, चीन के शातिर दिमाग से  अच्छी तरह से परिचित है। 

चीन का प्रोपेगेंडा तंत्र बहुत मज़बूत है जो लगातार अलग -अलग ढंग से  चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रोपेगेंडा को फ़ैलाने में  लगा हुआ है। 
ग़ौरतलब है कि चीन में ब्रॉडकास्टिंग और प्रेस /मीडिया पर पूरी तरह से चीनी सरकार का कंट्रोल है, स्वतंत्र मीडिया नाम की कोई चीज नहीं है, ऐसे में सरकारी प्रोपेगेंडा को फैलाना आसान हो जाता है। 

आइए समझते हैं कि  'प्रोपेगेंडा ' क्या होता है? 


प्रोपेगंडा (Propaganda) का हिन्दी में शाब्दिक अर्थ है अधिप्रचार अथवा मत-प्रचार। 
प्रोपेगंडा किसी विशेष उद्देश्य से, विशेष तौर से राजनीतिक उद्देश्य के तहत, किसी विचार और नज़रिये को फैलाने के लिए किया जाता है। लेकिन इसकी बुनियाद आम तौर पर सत्य पर नहीं टिकी होती। प्रोपेगंडा की शुरुआत युद्ध के दौरान दुश्मन की सेना को नैतिक रूप से पराजित करने के लिए एक अफ़वाह के रूप में हुई थी। 

अधिप्रचार (Propaganda) उन समस्त सूचनाओं को कहते हैं जो कोई व्यक्ति या संस्था किसी बड़े जन समुदाय की राय और व्यवहार को प्रभावित करने के लिये संचारित करती है।

सबसे प्रभावी अधिप्रचार के बहुत से तरीके हैं। इसका उद्देश्य सूचना देने के बजाय लोगों के व्यवहार और राय को प्रभावित करना (बदलना) होता है। WW-2 में प्रोपेगेंडा का जबरदस्त इस्तेमाल किया गया था। 

यह एक प्रकार से 'मनोवैज्ञानिक युद्ध' होता है। 


चीन का भारत के खिलाफ़ प्रोपेगेंडा-युद्ध 


भारतीय सेना के मुकाबले चीनी सेना कितनी मजबूत है ये दिखाने के लिए चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स के आधिकारिक ट्विटर हैंडिल से सैकड़ों ट्वीट्स किए गए हैं और प्रतिदिन कोई ना कोई झूठ या यूँ कहें प्रोपेगेंडा ट्वीट के माध्यम से फैलाए जा रहे हैं। 


एक ट्वीट में ये दिखाया गया है कि कैसे चीनी सैनिक आँख पर पट्टी बांधकर अपने हथियारों को कुछ ही सेकंड में रि-असेंबल कर देते हैं, हद तो तब हो गयी जब ग्लोबल टाइम्स ने हॉलीवुड के एक सीन को उठाकर उसे चीनी वायुसेना का 'अभ्यास' बताते हुए ट्वीट कर दिया। 

एक वीडियो ट्वीट करके ग्लोबल टाइम्स ने उसे अपनी आर्मी का ड्रिल बताते हुए लिखा कि "दुनिया की कोई सेना इस सेना का मुकाबला नहीं कर सकती।"

बाद में फैक्ट चेक में पता चला कि वो विडियो 'एनिमेटेड' था। 

गलवान वैली में हुए झड़प में भारत के 20 जवान शहीद हो गए थे भारत ने इसे आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया था और भारतीय सेना की तरफ़ से ये भी कहा गया था कि चीन के भी 20 से ज्यादा जवान शहीद हुए हैं।

अमेरीका से लेकर कई यूरोपीय देशों के खुफिया एजेंसियों ने तो चीन के 43 सैनिकों के मारे जाने की बात कही।

लेकिन चीन की ओर से ऐसा कोई आधिकारिक बयान नहीं आया कि उसके कितने सैनिक मारे गए हैं, उल्टा चीन ने ये झूठ फैला दिया कि भारत के कई जवान उसके कब्जे में हैं। 

फिर क्या था वही हुआ जो चीन चाहता था, भारत की विपक्षी पार्टियां प्रधानमंत्री से इस्तीफ़ा मांगने लगीं,

प्रधानमंत्री को 'सरेंडर मोदी' कहा जाने लगा, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की तरफ़ से तमाम ट्वीट्स किए जाने लगे। 

विपक्षी कहने लगे कि प्रधानमत्री ने चीन के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है, सिर्फ भारत के जवान मारे गए चीन के नहीं, चीन ने कई भारतीय सैनिकों को बंधक बना लिया है, इत्यादि। 

विपक्षी पार्टियों के ट्वीट्स को चीनी और पाकिस्तानी हैंडल द्वारा रि-ट्वीट किया जाने लगा। 

विशेषकर, राहुल गांधी के उस ट्वीट को जिसमें उन्होंने प्रधानमत्री को 'Surrender Modi' कहा था। 

ऐसे समय में जब पूरे देश को, सभी पार्टियों को सारे मतभेद भुलाकर  चीन के खिलाफ़ लामबंद हो जाना चाहिए था और एक स्वर में चीन की निंदा करनी चाहिए थी उस वक़्त सभी विपक्षी पार्टियों ने देश, देश की सेना और प्रधानमत्री के खिलाफ बोलकर चीनी-प्रोपेगेंडा को और बल दे दिया। 

कुल मिलाकर वही हो रहा था जो चीन चाहता था। 

ऐसे समय में जब रणनीतिक महत्व की जानकारियां सेक्रेट रखी जाती हैं तथा उन्हें मीडिया में साझा नहीं किया जाता तब सोनिया गांधी उन जानकारियों जैसे सेना की तैनाती, लोकेशन, हथियार की तैनाती आदि को सार्वजनिक करने की माँग कर रहीं थीं। 

चीन, भारत के विपक्षी दलों को अपने प्रोपेगेंडा वार में हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने में अबतक सफल रहा है। 

युद्ध की सी स्थिति में किसी भी देश को राजनीतिक मतभेद भुला कर दुश्मन देश के प्रोपेगेंडा से बचना कितना जरूरी है इसके लिए 1982 के ब्रिटेन व अर्जेंटीना  के बीच 'Falkland' युद्ध से बेहतर उदाहरण दूसरा नहीं हो सकता। 

'Falkland' दक्षिण अमरीका के सुदूर दक्षिण-पूर्व में एक बड़ा द्वीप है जो अर्जेंटीना के तट से कुछ ही दूरी पर है परंतु इसपर हज़ारों किलोमीटर दूर स्थित ब्रिटेन का शासन था। 
इसपर आधिपत्य को लेकर ब्रिटेन और अर्जेंटीना में 1982 में युद्ध छिड़ गया। 
अर्जेंटीना के राष्ट्रपति लियोपोल्डो ने 2 अप्रैल 1982 को युद्ध की घोषणा कर दी। उस समय ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मारग्रेट थैचर थीं। 

अर्जेंटीना उस समय बहुत शक्तिशाली हुआ करता था, अर्जेंटीना ने एक युद्धपोत से AM-39 Exocet मिसाइल दागकर ब्रिटेन के HMS शेफील्ड जहाज को डुबो दिया। 
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह पहली बार था कि कोई ब्रिटिश जहाज  किसी युद्ध में डूबा हो। 
अर्जेंटीना का क्रूज़र जनरल बेलगरानो ऐसा युद्धपोत था  जो ब्रिटिश रेडार के पकड़ में आ ही नहीं रहा था। ये युद्धपोत स्टील्थ फीचर से लैस था। कहते हैं कि ये युद्धपोत अकेले 50% युद्ध लड़ रहा था । इस पोत नेे अर्जेंटीना को अकेले जीत के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया था। ऐसे में  ब्रिटेन के लिए इस पोत को नष्ट करना सबसे  अधिक आवश्यक हो गया था लेकिन ब्रिटेन पूरी ताकत लगाने के बाद भी इसका पता नहीं लगा पा रहा था। 

  

 ये  युद्ध जीतना ब्रिटेन और प्रधानमंत्री थैचर के लिए 'आत्मसम्मान' की बात थी। मार्गरेट थैचर के सामने करो या मरो की स्थिति थी। 
तब ब्रिटेन ने प्रोपेगेंडा का सहारा लिया और बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस करके ये झूठ फैला दिया गया कि अर्जेंटीना का युद्धपोत जनरल बेलगरानो को डुबो दिया गया है और उसके साथ 600 सैनिक भी मारे गए हैं। 
ये ख़बर अर्जेंटीना के विपक्षियों ने हाथों हाथ लिया.. 
विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति लियोपोल्डो से इस्तीफ़ा माँगना शुरू कर दिया, सड़कों पर राष्ट्रपति के पुतले जलाये जाने लगे। 
सड़कों पर प्रदर्शन होने लगा, दंगे भड़क गए। 
राष्ट्रपति लियो बहुत दबाव में आ गए और उन्होंने  विपक्ष को संतुष्ट करने के लिए युद्धपोत जनरल बेलगरानो के लोकेशन, उसपर तैनात सैनिकों के बारे में मीडिया को बता दिया। 
बस क्या था कुछ ही घंटों में ब्रिटिश सबमरीन 
HMS Conquerer ने मिसाइल दाग कर युद्धपोत जनरल बेलगरानो को सच में डुबो दिया और इसी के साथ अर्जेंटीना के 300 सैनिक भी मारे गए, ब्रिटेन ने हारी हुई बाजी जीत ली थी। 
जून 1982 में अर्जेंटीना ने आत्म समर्पण कर दिया। 
इस युद्ध में प्रोपेगेंडा सबसे शक्तिशाली हथियार साबित हुआ। 

ठीक यही काम चीन कर रहा है, चीन भारत से प्रोपेगेंडा-युद्ध लड़ रहा। वो झूठ और भ्रम फैलाकर भारत में अस्थिरता और आंतरिक कलह पैदा करना चाहता है और इसके लिए वो यहाँ की विपक्षी पार्टियों, लेफ्ट-बुध्दिजीवियों और वामपंथी झुकाव वाली मीडिया का प्रयोग कर रहा। 
सरकार ने 59 चीनी ऐप्स को बैन करने का निर्णय लिया तो इसका उपहास उड़ाया गया, सरकार ने सभी सरकारी प्रोजेक्ट्स से चीनी निवेश को रद्द करने और प्रत्येक चीनी उत्पादों को पोर्ट पर ही जाँचने का फैसला लिया तो उसका मज़ाक बनाया गया। 
विपक्ष अगर  सरकार का समर्थन नहीं कर सकता था तो विरोध भी नहीं करना चाहिए  था क्योंकि ये किसी पार्टी से ज्यादा पूरे देश की बात थी। 
एक राष्ट्र के तौर पर हमें  राजनीति और राष्ट्रनीति को अलग-अलग चश्मे से देखना होगा। 
राजनीति भले अलग हो लेकिन राष्ट्र नीति एक होनी चाहिए। 
देश की सभी राजनीतिक पार्टियों को किसी भी प्रकार से दुश्मन देश की मदद ना करने का प्रण करना होगा और ऐसे समय में एकजुटता बना कर रखनी होगी। 
हमें राजनीतिक तौर पर और ज्यादा मेच्योर व जिम्मेदार बनना होगा। 





ये मेरे अपने विचार हैं। किसीके भावनाओं को ठेस पहुंचाने की कोई मंशा नहीं। 
  







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