बिहार का बहुचर्चित 'अंखफोड़वा कांड' जिसने पूरे दुनिया को हिला कर रख दिया था। 'अंखफोड़वा कांड' क्या है?

'आंख दिखाता है मादरजात' ये डायलॉग तो आपने सुना ही होगा। ये पिछले दशक की ब्लॉकबस्टर फ़िल्म 'गंगाजल' का सबसे चर्चित डायलॉग था। आइए जानते हैं इस 'डायलॉग' के पीछे की पूरी कहानी.... 

दरअसल, प्रकाश झा निर्देशित फ़िल्म गंगाजल (2003) की पृष्ठभूमि एक सत्य घटना पर आधारित थी, यह एक क्राइम-थ्रिलर श्रेणी की फ़िल्म थी जिसके लीड-रोल में अजय देवगन थे जिन्होंने SP अमित कुमार के रूप में एक ईमानदार और सख्त पुलिस ऑफिसर का रोल निभाया था। 

ये फिल्म 1979 के भागलपुर, बिहार में हुए दुनिया भर में चर्चित  'अंखफोड़वा कांड'  पर आधारित थी। 

           अंखफोड़वा कांड क्या है ? 
बिहार का भागलपुर शहर रेशमी वस्त्रों के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध रहा है। गंगा के तट पर बसे इस शहर को नाम के साथ बदनामी भी खूब झेलनी पड़ी है। 

सन् 1979 में भागलपुर, बिहार की एक घटना ने पूरे देश-दुनिया को हिला कर रख दिया था। 
तब बिहार से झारखंड अलग नहीं हुआ था और पूरे बिहार में गुंडाराज, भ्रष्टाचार और दहशत का माहौल था।
खनन माफ़िया उंगलियों पर राज्य के शासन-प्रशासन को नचाते थे। आए दिन राज्य में हत्याएँ, सामूहिक बलात्कार, किडनैपिंग और दंगे हो रहे थे। 
आम जनता दहशत भरे माहौल में जीने को मजबूर थी। ।
 
इसी बीच भागलपुर की एक घटना ने जरायम की दुनिया को हिला कर रख दिया।
'अंखफोड़वा कांड' जरायम के खिलाफ कानून से परे जाकर उठाया गया बर्बर कदम था।

33 खूंखार माफ़िया इस घटना के शिकार हुए थे, जिनकी आंखों में तेजाब डालकर हमेशा के लिए उसे बंद कर दिया गया था। 

दरअसल, पुलिस विभाग अपराधियों से इतनी त्रस्त हो गई थी कि उसे ये अमानवीय कदम मजबूरन उठाना पड़ा।

पुलिस रात में गस्त पर निकलती और इलाक़े के खूंखार अपराधियों को बिना वारंट के गिरफ्तार कर लेती और थाने लाकर उनके आँखों में तेजाब डालकर उन्हें अँधा कर दिया जाता था। 

 इस कांड की वजह से सरकार की काफी आलोचना भी हुई थी। इस मामले के तूल पकड़ने के बाद एक जांच समिति भी बनाई गई। समिति ने तीन दर्जन लोगों की आंखों में तेजाब डालने की पुष्टि की।


1979 में भागलपुर, नवगछिया थाने से हुई थी शुरुआत ~

इसकी शुरुआत 1979 में नवगछिया थाने से हुई थी। इसके बाद सबौर, बरारी, रजौन, नाथनगर, कहलगांव आदि थाना क्षेत्रों से भी ऐसी खबरें आईं। बाद में दूसरे थानों में भी ऐसा किया जाने लगा। पुलिस अपराधियों को पकड़ने के बाद उनके आंख फोड़ देती। इसके बाद उनके चेहरे पर तेजाब डाल दिया जाता। और ये सिलसिला करीब साल भर तक चला। 

इस दौरान  बी डी राम भागलपुर के एसपी हुआ करते थे।जो अपने सख्त स्वभाव,  ईमानदार छवि  और कर्तव्यनिष्ठा के लिए लोकल  लोगों में काफ़ी लोकप्रिय थे। 


 मामला पटना से लेकर दिल्ली तक उछला लेकिन पुलिस के हाथ नहीं रुके। उस दौरान दिन भर अलग अलग थानों की पुलिस अपराधियों को पकड़ती, रात को उनकी आंखें फोड़ दी जाती फिर तेजाब डालकर अंधा कर दिया जाता। इस तरह की जानकारी सुप्रीम कोर्ट की जांच समिति को कुछ अंधे कैदियों ने दी थी। बाद में कोर्ट के आदेश पर कई पुलिस वाले सस्पेंड हुए, बड़े अफसरों का तबादला हुआ। इसके बाद वीडी राम की पहचान अंखफोड़वा एसपी के तौर पर होने लगी। बेतिया और मुजफ्फरपुर जैसे शहर में तब अपराधियों का बोलबाला हुआ करता था लेकिन वीडी राम के आने से सब तड़ीपार हो गये थे। 


'ऑपरेशन गंगाजल' नाम दिया गया था  इस कांड को : 

बीडी राम के अनुरोध पर घटना की सीबीआइ से जांच कराई गई थी। इस घटना में शामिल डीएसपी शर्मा, इंस्पेक्टर मांकेश्वर सिंह व दरोगा वसीम समेत एक दर्जन पुलिस पदाधिकारियों के खिलाफ बर्खास्तगी की कार्रवाई की गई थी। पुलिस महकमे में अंखफोड़वा कांड का गुप्त नाम 'ऑपरेशन गंगाजल' था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह 'ब्लाइंडिंग केस'  के रूप में जाना गया।

इस कांड ने एक नयी बहस छेड़ दी थी कि क्या पुलिस को संविधान से ऊपर जाकर, क़ानून से परे कोई निर्णय लेने का अधिकार है या नहीं? 

जहाँ बुद्धिजीवियों, देशी-विदेशी मानवाधिकार संगठनों की तरफ़ से पुलिस के इस कृत्य  की अत्यंत सख्त लहज़े में आलोचना की गई, वहीं आम जनता व दहशत के माहौल में जी रहे लोग  पुलिस और एसपी विष्णु दयाल राम को अपना हीरो  मानने लगे थे। 

कहाँ हैं वो 33 पीड़ित अपराधी  और क्या करते हैं? 

वो लोग जिनकी आँखे इस घटना के बाद बुझ गई थीं उनमे से 13 लोग एक-दो साल के अंदर ही अच्छे इलाज के अभाव में काल-कवलित हो गए और जो बच गए उन्हें सरकार की ओर से 750 रुपये प्रति माह का पेंशन मिलता है। 
मेरी विचार से किसी के भी साथ, वो चाहे अपराधी हो या पशु, इस प्रकार की बर्बरता नहीं करनी चाहिए। 

सबकुछ क़ानून के दायरे में होना चाहिए, सबको न्याय पाने का अधिकार है।

सुपर कॉप एसपी विष्णु दयाल राम  ~

भागलपुर के तत्कालीन एसपी वी डी राम ने इस कांड में अपनी संलग्नता से इंकार किया था और उन्हीं के अनुरोध पर इस मामले में की जाँच के लिए एक जाँच-समिति का गठन भी किया गया । 
आरोपी पुलिस वालों को सस्पेंड कर दिया गया था। 

वी डी राम 1973 बैच के बिहार कैडर के आईपीएस अधिकारी थे. ये काफी तेज - तर्रार, सख्त स्वभाव वाले ईमानदार पुलिस ऑफिसर थे। ये 2007-2010 तक झारखण्ड के डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (DGP) भी रहे। 
2014 में इन्होंने राजनीति में अपना कदम रखा और भाजपा में शामिल हो गए। 

पालमु लोकसभा सीट से 2014 में भाजपा के टिकट से चुनाव लड़ा और भारी मतों से जीतकर संसद पहुचें एवँ 2019 में पूनः उसी सीट से जीतकर फ़िर से संसद में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी।
आज भाजपा में वी डी राम एक महत्वपूर्ण शख्सियत हैं। 


                           कौशिक दुबे 🖋️


















Post a Comment

0 Comments