'राहत' इंदौरी का एक चेहरा ये भी। शायरी की आड़ में कट्टर इस्लामिक विचारों को फैलाते रहे राहत कुरैशी।

शायरी की आड़ में कट्टर इस्लामिक विचारों को फैलाते रहे 'शायर' साहब

                                                     ✒️  कौशिक 

मशहूर शायर डॉ राहत इंदौरी का कोरोना वायरस संक्रमण के बाद दिल का दौरा पड़ने के कारण कल शाम (11 अगस्त, 2020) को निधन हो गया। उनकी मौत के बाद उनके चाहने वालों ने सोशल मीडिया पर उनकी कुछ शायरियाँ शेयर करके उन्हें श्रद्धांजलि दी। इसी बीच कुछ मुशायरों में अपनी बात रखते हुए उनकी कई पुरानी वीडियोज भी वायरल होना शुरू हुईं।

राहत इंदौरी शेर-ओ-शायरी की दुनिया के बादशाह थे। युवा वर्ग में उनकी ख़ासी पैठ थी। हर समुदाय के श्रोताओं ने उनपर अपना प्यार लुटाया, तालियों की गड़गड़ाहट से उनके उर्दू की कविताओं और शायरीयों को इज़्ज़त बख्शा। क्या हिंदू, क्या मुस्लिम सभी उनकी शायरीयों पर उमंगित हो उठते थे परन्तु राहत साहब तो शायरी की आड़ में अपने कट्टर धार्मिक विचारों को फ़ैलाने में लगे थे। अगर आप सोचते  हैं कि शायरी और कविताओं के माध्यम से सिर्फ प्यार-मोहब्बत, अमन-चैन और देशभक्ति की नज़्मों को फैलाया जाता है तो आप ग़लत हैं। 
शायरी और कविताएँ कट्टरपंथी विचारों और धार्मिक उन्माद को भी फ़ैलाने का बड़ा माध्यम रहीं हैं। 

राहत इंदौरी भी ऐसे ही शायर और कवि थे जिसने शायरी और कविताओं का प्रयोग अपने कट्टर विचारों को फ़ैलाने में किया। 

अर्बन-नक्सलियों, देश विरोधी वामपंथियों और कट्टर इस्लामिक विचारकों द्वारा आयोजित भीमा-कोरेगांव  यलगार परिषद  की बैठक हो या एंटी  -CAA प्रोटेस्ट, 'राहत' की शायरी और कविताओं का हर जगह ख़ूब प्रयोग हुआ।

फ्रॉड सेकुलर गैंग के हीरो रहे राहत इंदौरी जीवन के आखिरी दिनों में खुलकर जेहादी सोच को दिखाने लगे थे। ओवैसी के मंचो पर चढ़कर जहरीले शेर सुनाना राहत इंदौरी का खास शौक था।

कभी वाजपेयी के घुटनों पर घटिया सेक्सुअल जोक, कभी रामचरितमानस का मजाक, कभी गोधरा कांड में जलाकर मारे गए कारसेवकों के बारे में झूठ और कभी CAA के विरोध के नाम पर इस्लामिक आतंक को चाशनी में डूबोकर परोसने की छिछोरी कोशिशों के लिए हमेशा याद किया जाएगा राहत इंदौरी को। 

साल 2001 में श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के घुटने की सर्जरी हुई थी तो 'राहत' ने उन पर एक शायरी बनाई थी लेकिन मुशायरे में शायरी पढ़ने से पहले उसने वाजपेयी जी का नाम लेने से मना करते हुए कहा कि - “मैं किसी का नाम नहीं लेता हूँ अपने जुबान से। क्योंकि मेरे शेरों की कीमत करोड़ों रुपए है। मैं दो-दो कौड़ी के लोगों का नाम लेकर अपने शेर की कीमत कम नहीं करना चाहता।”


इसके बाद उसने वाजपेयी जी पर अपनी शायरी कही ~


रंग चेहरे का ज़र्द कैसा है

आईना गर्द-गर्द कैसा है

काम घुटनों से जब लिया ही नहीं

फिर ये घुटनों में दर्द कैसा है

इस शेर को सुनकर मुशायरे में ठहाके और तालियाँ गूँज गईं थीं। कुछ लोग उठकर आए थे और राहत को सम्मानित भी किया था। अब इसी मुशायरे की वीडियो को शेयर करके उनकी आलोचना की जी रही है।

ग़ौरतलब है कि   प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी अविवाहित थे और 'राहत' ने जब कहा कि "काम घुटनों से जब लिया ही नहीं "  तो इसका इशारा उनके 'व्यक्तिगत'  जीवन पर था।

राहत इंदौरी द्वारा गोधरा कांड पर की गई शायरी भी बेहद विवादित थी,एक मुशायरे में उन्होंने गोधरा कांड को लेकर ये कह दिया था कि उस दिन कारसेवकों के साथ कुछ हुआ ही नहीं था।


जबकि पूरी दुनिया जानती है कि अयोध्या से कारसेवकों का जत्था ट्रेन से लौट रहा था और जैसे ही ट्रेन 'गोधरा' पहुंची, हज़ारों की संख्या में इस्लामिक कट्टरवादी उस बोगी पर टूट पड़े जिसमें 'कारसेवक' बैठे थे और पूरी बोगी को पेट्रोल और केरोसिन डालकर फूँक दिया गया जिसमें 59 निर्दोष हिंदू जिंदा जल गए, मरने वालों में 8 छोटे- छोटे बच्चे भी थे। इस घटना के बाद गुजरात में दंगे शुरू हो गए थे। 

     राहत इंदौरी क्रिमिनल/हत्यारे अतीक अहमद के साथ



इसके बाद राहत इंदौरी अपना शेर फरमाते हुए कहते हैं:

जिनका मसलक है रौशनी का सफर
वो चिरागों को क्यों बुझाएँगें
अपने मुर्दे भी जो जलाते नहीं
जिंदा लोगों को क्या जलाएँगे


राहत इंदौरी ने अपने शेर-ओ-शायरी के जरिए 'गोधरा ट्रेन कांड' के दोषी हिंसक - जहरीली मुस्लिम भीड़ को बचाने का पूरा प्रयास किया। 


'राहत' ने ताउम्र एक ही काम किया - इस्लाम का 
प्रचार-प्रसार और हिंदू विरोधी बातें। 

मुशायरे में जब राहत इंदौरी के जेहादी शायरीयों पर भीड़ दाद देने के लिए तालियां बजाती थी तो मुशायरे में बैठे हिंदू-श्रोता ठगे हुए महसूस करते थे। हिन्दुओं को लगता था कि जैसे वो अकेले पड़ गए हों जैसे पाकिस्तान के इस्लामी भेड़ियों के सामने कोई हिंदू बस्ती हो और उन्हें मजबूरन सबकुछ बर्दाश्त करना पड़ रहा हो। 
क्योंकि 'राहत' की शायरीयों में कट्टरता की दुर्गंध आती थी।

 एक ऐसी ही शायरी है - 

किसका नारा, कैसा कौल, अल्लाह बोल 
अभी बदलता है माहौल, अल्लाह बोल 

दल्लालों से नाता तोड़, सबको छोड़
भेज कमीनो पर लाहौल, अल्लाह बोल


कैसे साथी, कैसे यार, सब मक्कार
सबकी नीयत डांवाडोल, अल्लाह बोल

हर पत्थर के सामने रख दे आइना
नोच ले हर चेहरे का खोल, अल्लाह बोल

ये शायर की कम, एक कट्टर इस्लामिक जेहादी की पंक्तियाँ ज्यादा लगती हैं। 

'राहत' की शायरीयां और उर्दू की कविताएं हमेशा देश विरोधी गतिविधियों में काम आयी हैं। एंटी-CAA प्रोटेस्ट में तो 'राहत' की शायरीयों को तख्तियों पर लिखकर लहराया जाता था। 


राहत इंदौरी पर आपकी क्या राय है? कमेन्ट करके जरूर बताएँ। 


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